बहुत बार सोचा तुम्हें भी अपने सोच से निकाल शब्दों में दाल दूँ,
कुछ ऐसा कर दूँ की तुम्हारी यादें अब न आए सामने मेरे,
पर जाने तुम्हें इन शब्दों में लिखना इतना मुश्किल क्युं है?
जानता हूँ मिटा नही सकता तुम्हें,
इस लिए तो लिखना चाहता हूँ,
पर जाने तुम्हें इन शब्दों में लिखना इतना मुश्किल क्युं है?
तुम बस रेत पर बनी एक तस्वीर हीं तो थी,
जो मैंने अपने हाथों से बनाया था,
पर ऐसा क्युं लगता है की चाह कर भी सागर की लेहरें तुम्हें मिटा नहीं पाती,
और मेरा देखो मैं तो बस तुम्हें लिखना चाहता हूँ,
पर जाने तुम्हें इन शब्दों में लिखना इतना मुश्किल क्युं है?
फ़कीर (अमित )
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