Dec 26, 2008

बंध जाऊं सबके साथ !!

डर कर छुप जाऊं कहीं,
या बन पक्षी उड़ जाऊं,
जाऊं आस्मां के उस पार,
जहाँ न कोई मुझे पहचाने,
न मैं किसी को ।

या सब को ख़ुद में समेट लूँ,
सब मुझमें समां जायें,
और मैं सब का प्रतीबिम्ब बन जाऊं ।

एक ज़ोर का तूफ़ान आए,
हम सभी को अपने साथ बहा ले जाए,
कुछ ऐसे मिला दे हमें एक साथ,
चाह कर भी अलग न हो पाएं,
यूँ बंध जायें साथ,
कोई दूसरा तूफ़ान भी उस बंधन को न तोड़ पाये ।



3 comments:

anu said...

hmmmmmm after stories, personal experiences, fakir-rasputin posts and poems now u came up with short poems ................

good going and good work.....:)

Manish said...

I liked this poem.. very much different one....

avsar said...

@anu

thnx for appreciation!!!..:)

@manish bhaiya

glad that you liked it bhaiya!!..:)

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