Dec 25, 2008

मैं अकेला था, अकेला हीं रह गया!

हवा चली थी अभी,
या किसी के आने की आहट थी,
मैंने कुछ तो सुना था,
कोई आया हीं होगा शायद,
क्युंकी यहाँ हवा तो चलती नहीं,
किसकी कोशिश होगी आने कि,
मुझसे क्या काम होगा किसी को,
क्या किसी को मेरी भी ज़रूरत आई होगी?

नहीं ऐसा तो नहीं हो सकता,
मुझसे किसी को क्या काम पर सकता,
उन्होंने ख़ुद हीं तो मुझे निकाला था,
अपने पास से हीं नहीं,
अपने ख़यालों से भी हटाया था,
पर किसी कि आहट सी तो आई थी,
कोई तो आया था,
शायद मिलना चाहते हो मुझसे,
शायद देखना चाहते हों मुझे,
हाँ , यही बात होगी,
उन्हें अभी भी मेरी साँसों कि आदत होगी।

दरवाज़े के पास जाता हूँ,
कोई बाहर आया है,
उसे अन्दर लाता हूँ।

पर यहाँ तो कोई नहीं,
क्या इस बार भी ये बस मेरा खयाल था,
क्या कोई मुझसे मिलने नहीं आया था,
वो आहट फ़िर से मेरा भ्रम निकला,
मैं अकेला था,
अकेला हीं रह गया !

मैं अकेला था,
अकेला हीं रह गया !


2 comments:

उन्मुक्त said...

अच्छी कविता है। हिन्दी में और भी लिखिये।

avsar said...

जी, बिल्कुल, कोशिश करूंगा कि ज़्यादा से ज़्यादा हिन्दी में हीं लिखूं ।

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